ग्रामीण टैक्स पर बरसे सुधाकर सिंह, बोले, अमीर लोगों के बैंक लोन को माफी और ग्रामीणों पर टैक्स का बोझ
राष्ट्रीय जनता दल के बक्सर से सांसद सुधाकर सिंह ने राज्य सरकार द्वारा बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के अंतर्गत बिहार ग्राम पंचायत(कर,दर एवं शुल्क) नियमावली, 2026 को स्वीकृति दिए जाने पर करारा हमला किया है। उन्होंने कहा कि यह गाँवों को लूटने वाला फैसला हैं । जहां एक तरफ ग्रामीण महंगाई, बेरोजगारी के मार झेल रहे हैं ऐसे में यह नियमावली उनके आर्थिक दोहन से स्थिति को और कमजोर करेगा। उन्होंने यह बातें शनिवार को राजाधानी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही।
सुधाकर सिंह ने कहा कि बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 26(5)(घ) एवं धारा 27 ग्राम पंचायतों को राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों एवं निर्धारित अधिकतम दरों के अधीन विभिन्न प्रकार के कर, दर एवं शुल्क लगाने का अधिकार प्रदान करती हैं। किंतु बिहार जैसे आर्थिक रूप से कमजोर राज्य में इन प्रावधानों का व्यापक एवं अंधाधुंध उपयोग ग्रामीण समाज पर गंभीर आर्थिक एवं सामाजिक दुष्प्रभाव डालेगा। बिहार आज भी प्रति व्यक्ति आय, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और ग्रामीण आय के मामले में देश के अग्रणी राज्यों से काफी पीछे है । यहाँ करोड़ों लोग आज भी कृषि, दिहाड़ी मजदूरी, छोटे-मोटे व्यवसाय, पारंपरिक कुटीर उद्योग एवं असंगठित क्षेत्र पर निर्भर हैं । ऐसे राज्य में यदि पंचायतों के राजस्व बढ़ाने का सबसे आसान माध्यम ग्रामीण जनता पर नए कर एवं शुल्क थोपना बन जाए, तो इसका सबसे बड़ा शिकार वही गरीब और मेहनतकश वर्ग होगा, जिसकी आय पहले से ही सीमित है। सबसे पहले इसका प्रभाव उन लोगों पर पड़ेगा जो ठेला, खोमचा, रेहड़ी, टमटम, रिक्शा, बैलगाड़ी, हाथगाड़ी अथवा छोटे परिवहन साधनों के माध्यम से अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। इन लोगों की आमदनी निश्चित नहीं होती। कई बार पूरे दिन की मेहनत के बाद भी इतनी आय नहीं होती कि परिवार का भोजन, बच्चों की पढ़ाई और दवा का खर्च आसानी से चल सके। ऐसे लोगों पर यदि हाउस टैक्स, नल-जल टैक्स, पंजीकरण शुल्क, उपयोग शुल्क अथवा अन्य स्थानीय करों का बोझ बढ़ता है, तो उनकी आजीविका और अधिक संकट में पड़ जाएगी। किसानों को सिचाई करने, गाँव में मेला लगाने, सड़क पर लाइट लगाने पर भी सरकार टैक्स लेगी ।
उन्होंने यह भी कहा कि इसी प्रकार बढ़ई, लोहार, कुम्हार, माली, नाई, धोबी, मोची, दर्जी, राजमिस्त्री, पेंटर, बिजली मिस्त्री, प्लंबर, बांस एवं बेंत का काम करने वाले कारीगर, चूड़ी बेचने वाले, सब्जी विक्रेता, फल विक्रेता, फूल बेचने वाले, मछली विक्रेता, दूध विक्रेता तथा अन्य पारंपरिक व्यवसायी पहले से ही सीमित आय पर जीवनयापन करते हैं। इनकी कमाई प्रतिदिन के श्रम पर निर्भर करती है। यदि इन पर भी पंचायत स्तर पर कर एवं शुल्क का अतिरिक्त बोझ डाला जाएगा, तो यह उनकी आय में सीधी कटौती होगी। ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे दुकानदार जैसे चाय की दुकान, पान की दुकान, किराना दुकान, साइकिल मरम्मत की दुकान, मोबाइल रिपेयरिंग, नाश्ते की दुकान, सिलाई की दुकान तथा अन्य सूक्ष्म उद्यम पहले ही बढ़ती महँगाई, बिजली दरों, परिवहन लागत और घटती क्रय शक्ति से प्रभावित हैं। ऐसे में यदि स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त कर एवं शुल्क लगाए जाते हैं, तो उनकी लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ अंततः ग्रामीण उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा।
उनका कहना था कि सबसे गंभीर चिंता यह है कि पंचायतों द्वारा लगाए जाने वाले करों एवं शुल्कों का प्रभाव केवल कर देने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पूरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। छोटे व्यवसायियों की लागत बढ़ेगी, वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि होगी, रोजगार के अवसर घटेंगे और ग्रामीण बाजारों की क्रय शक्ति कमजोर होगी। इससे स्थानीय आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ सकती हैं। यह भी विचारणीय है कि बिहार के अधिकांश ग्रामीण परिवार पहले से ही अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष करों का बोझ वहन कर रहे हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर जीएसटी, पेट्रोल-डीजल पर कर, देश में सबसे महंगी बिजली बिल, विभिन्न सेवा शुल्क तथा अन्य वित्तीय दायित्वों के बीच यदि पंचायत स्तर पर भी अतिरिक्त कर लगाए जाएँ, तो गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति और अधिक कठिन होगी । यद्यपि धारा 27 पंचायतों को कर लगाने का अधिकार देती है, परंतु वही धारा यह भी स्पष्ट करती है कि यह अधिकार राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों एवं निर्धारित अधिकतम दरों के अधीन होगा। इसलिए यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इस अधिकार का उपयोग गरीब जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालने के साधन के रूप में न होने दे।
सुधाकर सिंह ने सीधा निशाना साधते हुए कहा कि आप सभी बिहार के नौकरशाही को भली-भांति जानते हैं । सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार और अवैध वसूली चरम सीमा पर है । ऐसी स्थिति में यदि ग्राम पंचायतों को विभिन्न प्रकार के कर, दर एवं शुल्क वसूलने का व्यापक अधिकार दिया जाता है, तो भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा होगे । आज स्थिति यह है कि जिन सेवाओं के लिए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क बहुत कम है, वहाँ भी आम नागरिकों से कई गुना अधिक राशि वसूली जाती हैं । भूमि की रसीद (लगान रसीद) कटवाने में भी निर्धारित शुल्क से कहीं अधिक राशि वसूली जाती हैं । इसी प्रकार, FIR दर्ज कराना पूरी तरह निःशुल्क प्रक्रिया है, फिर भी बिना पैसा दिए थाना में FIR नहीं लिखा जाता हैं । दाखिल खारिज पूर्णतः निशुल्क हैं लेकिन बिना पैसे का दाखिल खारिज तक नहीं होता हैं । जब पहले से उपलब्ध सरकारी सेवाओं में ऐसी स्थिति है, तब पंचायत स्तर पर नए कर एवं शुल्क लगाने का अधिकार भ्रष्टाचार के नए रास्ते खुलेंगे। इसके अतिरिक्त, यदि कोई गरीब परिवार आर्थिक तंगी के कारण पंचायत द्वारा लगाए गए कर या शुल्क का भुगतान समय पर नहीं करता है तो उसका नाम राशन कार्ड, बिजली कनेक्शन, सरकारी योजनाओं का लाभ, प्रमाण-पत्रों का निर्गमन या अन्य आवश्यक सेवाओं से काट दिया जाएगा । स्थानीय स्तर पर ऐसी मनमानी होंगी जिससे गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होगा। सरकार यह बताए कि एक ठेला चलाने वाला, टमटम हांकने वाला, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, माली, नाई, धोबी, मोची, सब्जी बेचने वाला या दिहाड़ी पर काम करने वाला व्यक्ति अतिरिक्त कर एवं शुल्क का भुगतान किस आय स्रोत से करेगा ।
उन्होंने निशाना साधते हुए कहा कि हद की बात तब है कि जहां एक तरफ अदानी और अंबानी जैसे लोगों का 17 लाख करोड़ से अधिक का बैंक लोन माफ किया जाता हैं, वही बिहार के ग्रामीण लोगों पर टैक्स लगाया जा रहा हैं । सबसे बेशर्मी की बात यह है कि बिहार के ही रहने वाले ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री, गिरिराज सिंह 2023 के एक संदेश में कहते है कि “भारत के प्रधानमंत्री द्वारा निर्धारित आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त करने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए, ग्रामीण निकायों कर लिए अपने स्वयं के राजस्व स्त्रोत सृजित करना आवश्यक हैं ।” इस मौके पर देश के जाने माने अर्थशास्त्री और भारत सरकार के प्लानिंग कमीशन के पूर्व सचिव और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ लेबर इकोनॉमिक्स रिसर्च के पूर्व महानिदेशक डॉ संतोष मेहरोत्रा भी उपस्थित रहें।
Trending News