राज्यसभा के रण में किसके खाते में जाएगा जादुई आंकड़ा?
राज्यसभा के रण में किसके खाते में जाएगा जादुई आंकड़ा?
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए गुरुवार को मतदान के साथ राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई। विधानसभा परिसर के भीतर विधायक अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे थे, जबकि बाहर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता अपनी-अपनी जीत को लेकर लगातार दावे करते नजर आए। चुनावी मुकाबले ने ऐसा माहौल बना दिया कि मानो परिणाम आने से पहले ही राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी जीत घोषित कर दी हो।
मतदान शुरू होने के साथ ही भाजपा खेमे का आत्मविश्वास खुलकर सामने आया। मतदान कर बाहर निकले भाजपा विधायक देवेंद्र कुंवर ने जीत का संकेत देते हुए कहा कि उनकी तरफ सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा है। उनके बयान ने विपक्षी खेमे के उत्साह को और बढ़ा दिया।
हालांकि, सत्तारूढ़ इंडिया गठबंधन ने भी भाजपा के दावों को तुरंत खारिज कर दिया। झामुमो के वरिष्ठ नेता मिथिलेश कुमार ठाकुर ने कहा कि गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या बल है और किसी तरह की टूट-फूट की संभावना नहीं है। उन्होंने विश्वास जताया कि गठबंधन के दोनों उम्मीदवार सफलता हासिल करेंगे और निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी को निराशा हाथ लगेगी।
इस चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी को लेकर सबसे अधिक चर्चा रही। भाजपा और उसके सहयोगी दल लगातार यह दावा करते रहे कि नाथवानी को अपेक्षा से अधिक समर्थन मिलने वाला है। भाजपा नेता भानु प्रताप साही ने कहा कि कई विधायक उनके पक्ष में मतदान करेंगे और वे आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने भी नाथवानी की संभावित जीत को लेकर भरोसा जताया। वहीं, भाजपा के चुनावी प्रतिनिधि अमर कुमार बाउरी ने भी दावा किया कि पर्याप्त संख्या में विधायक नाथवानी के समर्थन में खड़े हैं।
दूसरी ओर, महागठबंधन के नेताओं ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया। झामुमो उम्मीदवार बैजनाथ राम ने विधानसभा पहुंचने के दौरान कहा कि गठबंधन की स्थिति मजबूत है और दोनों सीटों पर जीत उसी की होगी। कांग्रेस नेता एवं मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने भी कहा कि वास्तविक संख्या बल महागठबंधन के पक्ष में है और परिणाम उनके दावों की पुष्टि करेंगे। माले के प्रतिनिधियों ने भी गठबंधन की जीत को लेकर पूरा भरोसा जताया।
राज्यसभा चुनाव के इस मुकाबले में मतदान के साथ-साथ राजनीतिक बयानबाजी भी चर्चा का केंद्र बनी रही। अब सभी की निगाहें मतगणना पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि दावों और हकीकत के बीच आखिर किसकी राजनीतिक गणित सही साबित होती है।
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