प्राइवेट यूनिवर्सिटी कानून पर HC की बड़ी टिप्पणी, सरकार को संशोधन की खुली छूट
प्राइवेट यूनिवर्सिटी कानून पर HC की बड़ी टिप्पणी, सरकार को संशोधन की खुली छूट
झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार को झारखंड प्राइवेट यूनिवर्सिटीज एक्ट, 2024 में संशोधन करने से रोकने का कोई न्यायिक प्रतिबंध नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी भी विधायिका के कानून बनाने या उसमें बदलाव करने के संवैधानिक अधिकार में न्यायालय सामान्य परिस्थितियों में हस्तक्षेप नहीं करता। अदालत का दायित्व कानून बनने के बाद उसकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा करना है, न कि विधायी प्रक्रिया को रोकना। यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने निजी विश्वविद्यालयों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता रोहिताश्य रॉय ने अदालत को बताया कि झारखंड प्राइवेट यूनिवर्सिटीज एक्ट, 2024 के कई प्रावधानों में संशोधन का मसौदा तैयार किया जा चुका है। उन्होंने जानकारी दी कि जिन धाराओं को निजी विश्वविद्यालयों ने अदालत में चुनौती दी है, वे भी प्रस्तावित संशोधनों में शामिल हैं। महाधिवक्ता ने यह भी कहा कि 28 जनवरी 2025 को पारित अंतरिम आदेश के बाद सरकार के सामने यह संशय था कि संशोधन विधेयक को विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है या नहीं।
इस पर हाईकोर्ट ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करते हुए कहा कि उसका 28 जनवरी 2025 का अंतरिम आदेश केवल 11 दिसंबर 2024 की अधिसूचना के आधार पर आगे की प्रशासनिक कार्रवाई पर रोक तक सीमित था। अदालत ने कहा कि उस आदेश का राज्य सरकार या विधानसभा की विधायी शक्तियों से कोई संबंध नहीं है। इसलिए सरकार चाहे तो संबंधित कानून में संशोधन करने अथवा नया विधेयक लाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।
खंडपीठ ने यह भी संकेत दिया कि यदि प्रस्तावित संशोधनों के बाद निजी विश्वविद्यालयों द्वारा उठाई गई आपत्तियां पूरी तरह या पर्याप्त रूप से समाप्त हो जाती हैं, तो अदालत पहले दिए गए अंतरिम संरक्षण को जारी रखने की आवश्यकता पर भी पुनर्विचार करेगी। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में व्यक्त किए गए सिद्धांत उन सभी समान मामलों पर भी लागू होंगे, जिनमें इसी प्रकार के अंतरिम आदेश प्रभावी हैं।
महाधिवक्ता ने अदालत को यह भी अवगत कराया कि संशोधन विधेयक को राज्य विधानसभा के वर्तमान मॉनसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना है। इस जानकारी के बाद हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर निर्धारित कर दी।
इस मामले में निजी विश्वविद्यालयों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार और इंद्रजीत सिन्हा के साथ अधिवक्ता तान्या सिंह, अंकित विशाल तथा प्राण प्रणय ने पक्ष रखा। अदालत के ताजा रुख के बाद अब सभी की नजर इस बात पर है कि राज्य सरकार प्रस्तावित संशोधनों को विधानसभा से कब और किस स्वरूप में पारित कराती है।
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