UGC के इक्विटी नियम 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, तकनीकी आपत्तियां दूर होते ही होगी सुनवाई

UGC के इक्विटी नियम 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, तकनीकी आपत्तियां दूर होते ही होगी सुनवाई

UGC के इक्विटी नियम 2026 पर सुप्रीम कोर्ट की नजर, तकनीकी आपत्तियां दूर होते ही होगी सुनवाई
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jan 28, 2026, 1:58:00 PM

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने” से जुड़े विनियम, 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताई। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में दर्ज तकनीकी कमियों को पहले दूर करना होगा, उसके बाद ही इसे औपचारिक रूप से सूचीबद्ध किया जाएगा।

मामले का तत्काल उल्लेख किए जाने पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि आवश्यक प्रक्रियात्मक खामियां ठीक होते ही अदालत इस पर सुनवाई करेगी। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “हमें स्थिति की जानकारी है। आप पहले डिफेक्ट्स दूर करें, हम मामले को सूचीबद्ध कर देंगे।”

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यूजीसी के ये इक्विटी विनियम शिकायत निवारण की व्यवस्था को सीमित दायरे में बांधते हैं, जिससे सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों के साथ भेदभाव की आशंका पैदा होती है। वकील ने यह भी कहा कि मौजूदा ढांचा प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र तक समान पहुंच सुनिश्चित नहीं करता।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियमों के तहत “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (एससी/एसटी/ओबीसी) तक सीमित कर दिया गया है। इससे इन वर्गों के अलावा अन्य समुदायों के लोगों को, भेदभाव के शिकार होने पर भी, कानूनी संरक्षण और औपचारिक शिकायत प्रक्रिया से बाहर रखा जा रहा है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी परिभाषा पीड़ित होने की कानूनी मान्यता को आरक्षित वर्गों तक सीमित कर देती है और सामान्य या उच्च जातियों से जुड़े व्यक्तियों को भेदभाव की गंभीरता या संदर्भ की परवाह किए बिना सुरक्षा के दायरे से वंचित कर देती है।

इसके साथ ही अदालत से यह भी अनुरोध किया गया है कि यूजीसी के इन विनियमों के तहत स्थापित समान अवसर केंद्र, इक्विटी हेल्पलाइन, जांच तंत्र और लोकपाल (ओम्बड्सपर्सन) की सेवाएं नियम 3(सी) में संशोधन या पुनर्विचार होने तक सभी के लिए जाति-निरपेक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण तरीके से उपलब्ध कराई जाएं।

याचिका में तर्क दिया गया है कि किसी व्यक्ति की जातिगत पहचान के आधार पर शिकायत निवारण व्यवस्था तक पहुंच से इनकार करना राज्य-प्रायोजित भेदभाव के समान है। यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15(1) (भेदभाव का निषेध) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि तकनीकी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मुद्दे पर किस दिशा में आगे बढ़ता है।