कभी देश के औद्योगिक विकास की पहचान रही हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचईसी) अब अपने अस्तित्व को संभालने के लिए अपनी ही जमीन को सबसे बड़ा संसाधन मानकर आगे बढ़ रही है। लगातार बढ़ते घाटे और आर्थिक दबाव के बीच कंपनी ने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को जमीन बेचने का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके लिए एचईसी प्रबंधन ने भारी उद्योग मंत्रालय और झारखंड सरकार से मंजूरी की मांग की है।
यदि अनुमति मिलती है, तो एचईसी पहले चरण में लगभग 1000 एकड़ जमीन बिक्री की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इस संबंध में स्मार्ट सिटी प्रबंधन और एचईसी के बीच बातचीत भी हो चुकी है। बताया जा रहा है कि स्मार्ट सिटी प्रबंधन ने 500 एकड़ जमीन की मांग रखी है, जिसके बदले एचईसी को करीब 5500 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है।
एचईसी ने खाली पड़ी जमीन का सर्वे शुरू कर दिया है। प्रबंधन की ओर से जमीन की कीमत 11.50 करोड़ रुपये प्रति एकड़ तय की गई है। इसी आधार पर यदि 500 एकड़ जमीन का सौदा होता है, तो कुल राशि 5500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
एचईसी के भीतर लंबे समय से वेतन भुगतान और अन्य देनदारियों का संकट बना हुआ है। प्रस्तावित जमीन बिक्री से प्राप्त राशि का उपयोग कर्मचारियों के बकाया भुगतान के साथ-साथ मशीनरी के आधुनिकीकरण और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में किए जाने की योजना है। कंपनी को उम्मीद है कि इससे आर्थिक स्थिति को स्थिर करने में मदद मिलेगी।
एचईसी इससे पहले भी जमीन का बड़ा हिस्सा राज्य सरकार को बेच चुकी है। वर्ष 2009 में कंपनी ने झारखंड सरकार को 2342.03 एकड़ जमीन हस्तांतरित की थी, जहां फिलहाल नया टाउनशिप विकसित किया जा रहा है। वहीं स्मार्ट सिटी टाउनशिप का निर्माण पहले ही 656 एकड़ जमीन पर किया जा चुका है। ऐसे में यदि इसमें एचईसी की अतिरिक्त 500 एकड़ जमीन शामिल होती है, तो आवासीय और व्यावसायिक विस्तार की संभावनाएं काफी बढ़ सकती हैं।
सूत्रों के अनुसार, स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत एचईसी क्षेत्र को एजुकेशन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही ग्रेटर रांची क्षेत्र में विधानसभा, राजभवन और हाईकोर्ट जैसी प्रमुख संरचनाएं पहले ही बन चुकी हैं। अब नए सचिवालय के निर्माण के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए आवासीय सुविधाएं विकसित करने की भी तैयारी चल रही है।
एचईसी प्रबंधन पहले ही CISF को 158 एकड़ जमीन आवंटित कर चुका है। इसके अतिरिक्त 313.31 एकड़ जमीन लीज पर दी गई है। फिलहाल कंपनी के पास करीब 3500 एकड़ जमीन बची हुई है, जिसे भविष्य के विकास और शहरी विस्तार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कंपनी के पुनरुद्धार की संभावनाओं पर तब और संकट गहराया जब केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि अब एचईसी को कोई नया वित्तीय पैकेज नहीं दिया जाएगा। जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार 2005 से 2017 के बीच किस्तों में करीब 4400 करोड़ रुपये की सहायता पहले ही प्रदान कर चुकी है।
एचईसी की वित्तीय स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। वर्ष 2004 में बीआईएफआर (बोर्ड फॉर इंडस्ट्रियल एंड फाइनेंशियल रिकंस्ट्रक्शन) ने कंपनी को बंद करने की सिफारिश की थी। हालांकि उस समय पुनरुद्धार पैकेज देकर कंपनी को चलाया गया। अब स्थिति यह है कि अचल संपत्तियों की बिक्री को ही फंड जुटाने का अंतिम विकल्प माना जा रहा है।
कंपनी के सामने सिर्फ घाटे की समस्या नहीं है, बल्कि उसकी जमीन पर अतिक्रमण भी गंभीर चुनौती बन चुका है। रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1800 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन पर 27 अवैध बस्तियां बस चुकी हैं। वहीं दूसरी ओर भू-माफिया की गतिविधियां भी एचईसी के लिए चिंता बढ़ा रही हैं।
सूत्र बताते हैं कि फंड की भारी कमी के कारण एचईसी कई बड़े वर्क ऑर्डर समय पर पूरा नहीं कर पा रही है। इससे कंपनी की आय और साख दोनों प्रभावित हो रही हैं।
कुल घाटा: करीब 4300 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है
31 मार्च 2025 तक वित्तीय देनदारी: 2067 करोड़ रुपये
अवैध बस्तियों में फंसी जमीन की अनुमानित कीमत: 1800 करोड़ रुपये
केंद्र सरकार से अब तक मिली सहायता: 4400 करोड़ रुपये
वर्तमान में उपलब्ध जमीन: लगभग 3500 एकड़
2009 में राज्य सरकार को बेची गई: 2342.03 एकड़
CISF को आवंटित: 158 एकड़
लीज पर दी गई: 313.31 एकड़
अब तक बेची/आवंटित/लीज पर गई जमीन (कुल): लगभग 473.34 एकड़