गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (G RAM G) विधेयक को लेकर भाजपा के दावों पर झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आलोक कुमार दूबे ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस विधेयक को रोजगार की ठोस गारंटी के बजाय पुराने कार्यक्रमों का नया लेबल बताते हुए कहा कि सरकार ऊँचे प्रचार के जरिए खोखली योजना पेश कर रही है।
दूबे ने कहा कि भाजपा की नीति नए विचारों से अधिक नाम बदलने तक सीमित रही है। उनके अनुसार, मनरेगा को G RAM G, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा को ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’, पुराने आवास कार्यक्रमों को प्रधानमंत्री आवास योजना और स्वच्छता अभियानों को स्वच्छ भारत मिशन के रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने सवाल किया कि यदि यह वास्तव में नई सोच का परिणाम है, तो बीते दस वर्षों में ग्रामीण बेरोजगारी और पलायन में ठोस कमी क्यों नहीं आई।
कांग्रेस महासचिव ने 125 दिनों के रोजगार के वादे पर भी संदेह जताया। उन्होंने कहा कि जब मौजूदा कानून के तहत 100 दिन के काम की गारंटी भी समय पर पूरी नहीं हो पाती, तो अतिरिक्त 25 दिनों का वादा कैसे निभाया जाएगा। उनके मुताबिक, विधेयक में काम न मिलने की स्थिति में मुआवज़े और दंड से जुड़े प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं, जिससे यह घोषणा कागज़ी बनकर रह जाती है।
वित्तीय हिस्सेदारी के मुद्दे पर दूबे ने केंद्र सरकार पर राज्यों पर बोझ बढ़ाने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि जहां पहले 90 प्रतिशत खर्च केंद्र वहन करता था, अब यह घटकर 60 प्रतिशत रह गया है और शेष 40 प्रतिशत राज्यों पर डाल दिया गया है। इसका असर भुगतान में देरी, काम की रफ्तार में कमी और मजदूरों की परेशानी के रूप में सामने आ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि रोजगार योजनाओं के संचालन में राज्यों और पंचायतों की भूमिका सीमित की जा रही है। पहले स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी, लेकिन अब अहम फैसले केंद्र स्तर पर तय किए जा रहे हैं, जिससे जमीनी प्राथमिकताएं प्रभावित हो रही हैं।
डिजिटल निगरानी और तकनीक के इस्तेमाल पर भी दूबे ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कमजोर नेटवर्क, सीमित स्मार्टफोन और कम डिजिटल साक्षरता वाले ग्रामीण इलाकों में केवल ऐप और तकनीक से पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं हो सकती। उनके अनुसार, भ्रष्टाचार रोकने के लिए तकनीक से ज्यादा जवाबदेही जरूरी है, जबकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ऑडिट की प्रक्रिया और उसकी जवाबदेही को लेकर विधेयक में स्पष्टता नहीं है।
कांग्रेस नेता ने दावा किया कि योजनाओं की जमीनी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं—मजदूरी भुगतान में लंबी देरी, मशीनों से काम कराकर श्रमिकों को दरकिनार करना, कमजोर सामाजिक ऑडिट और बिचौलियों की भूमिका। उन्होंने कहा कि नई योजना में स्थायी आजीविका का स्पष्ट खाका नहीं है और कौशल विकास, स्थानीय उद्योग या कृषि आधारित रोजगार से जोड़ने की कोई ठोस रणनीति सामने नहीं आती।
अंत में आलोक कुमार दूबे ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि वह ऐसी किसी नई योजना का उदाहरण दे, जिससे ग्रामीण आय में स्थायी बढ़ोतरी हुई हो। उन्होंने जोर दिया कि रोजगार का वास्तविक समाधान कृषि को मजबूत समर्थन, स्थानीय उद्योगों के विकास, कौशल आधारित स्थायी नौकरियों और मनरेगा में सार्थक सुधार से आएगा, न कि योजनाओं के नाम बदलने से।