राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रांची में आयोजित जनजातीय संवाद कार्यक्रम में कहा कि आदिवासी समाज और हिंदू समाज के बीच कोई भेद नहीं है। उनके अनुसार, हिंदू शब्द किसी एक पूजा पद्धति का संकेत नहीं करता, बल्कि यह जीवन जीने की ऐसी परंपरा है, जिसमें विविधताओं के बीच भी एकता का भाव अंतर्निहित है।
शनिवार को डीबडीह स्थित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि भारत की प्राचीन सभ्यता हजारों वर्षों से जंगल, कृषि और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ी है। उन्होंने बताया कि वेदों और उपनिषदों की मूल भावना भी इसी जीवन दृष्टि से जुड़ी हुई है, जो प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व पर आधारित है।
धर्म की अवधारणा पर बात करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि धर्म का वास्तविक अर्थ सत्य, सेवा, परोपकार और संयम है। जब समाज भोगवाद और स्वार्थ की ओर बढ़ा, तब आपसी मतभेद गहरे हुए और इसी का लाभ बाहरी आक्रांताओं ने उठाया।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्व में मूल रूप से एक ही धर्म है 'मानव धर्म' और यही हिंदू चिंतन की आधारशिला है। जनजातीय समाज के संदर्भ में उन्होंने शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण को अत्यंत आवश्यक बताया। उनका कहना था कि यदि बच्चों को अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरव का बोध कराया जाए, तो वे कभी अपनी राह नहीं भटकेंगे और यदि भटक भी गए, तो अपनी जड़ों की ओर लौट आएंगे।
संगठन और आत्मनिर्भरता पर जोर
भागवत ने जनजातीय समाज के समक्ष मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्मांतरण, भूमि हड़पने, सामाजिक शोषण और जनसांख्यिकीय बदलाव जैसी समस्याओं का सामना केवल संगठित होकर ही किया जा सकता है। उन्होंने जनजातीय भूमि की सुरक्षा, श्रम करने वालों के सम्मान, स्थानीय रोजगार के सृजन और सामाजिक समरसता को समय की प्रमुख आवश्यकता बताया।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने समाज से आत्मनिर्भर बनने, स्वाभिमान को जागृत करने और बाहरी शक्तियों पर निर्भरता की प्रवृत्ति छोड़ने का आह्वान किया।